Thursday, October 28, 2010

‘हिन्दी रत्न’ से सम्मानित हुए साहित्यकार श्रीकृष्ण शर्मा

जयपुर। राष्ट्रीय हिन्दी परिषद्, मेरठ द्वारा चेम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इण्डस्ट्री के सभागार में अपने रजत जयन्ति के उपलक्ष में आयोजित समारोह में साहित्यकार श्रीकृष्ण शर्मा को ‘हिन्दी रत्न’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। राष्ट्रीय हिन्दी परिषद् के अध्यक्ष डॉ. रत्नाकर पाण्डेय की अध्यक्षता में आयोजित हुए इस समारोह में उत्तर प्रदेश सरकार के राज्यमंत्री डॉ. यशवन्त सिंह ने शॉल ओढ़ा कर और चौधरी चरणसिंह विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नरेन्द्र कुमार तनेजा ने स्मृति चिन्ह देकर श्रीकृष्ण शर्मा को सम्मानित किया।

इस आयोजन में तमिल व तेलगू के प्रख्यात साहित्यकार डॉ. बालशौरी रेड्डी, हिन्दी के प्रख्यात विद्वान आचार्य भगवत दुबे, डॉ. गार्गीशरण मिश्र ‘मराल’, कविवर डॉ. मित्रेश कुमार गुप्त, डॉ. टी.जी. प्रभाशंकर प्रेमी, डॉ. एन.एस. विनयचन्द्रन, डॉ. अंजना संधीर, सरदार एच.एस. बेदी सहित देश भर से आए साहित्यकार शामिल हुए।  

‘राजस्थान की समकालीन हिन्दी कविता’ विषयक पर दो दिवसीय लेखक सम्मेलन

श्रीडूँगरगढ़ (विजय महर्षि)। राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर के सौजन्य से ‘राजस्थान की समकालीन हिन्दी कविता’ पर आधारित दो दिवसीय लेखक सम्मेलन का आयोजन राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति श्रीडूँगरगढ़ द्वारा 8 व 9 अक्टूबर 2010 को समिति भवन में आयोजित हुआ। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर गंगाराम जाखड़ ने कहा कि जब तक हमारी काव्य संवेदना लोक-संवेदना में एकाकार नहीं होगी तब तक वह जन समर्थन प्राप्त नहीं कर पायेगी। समकालीन कविता में अंतरण बेचैनी आज के जीवन के बीच मनुष्य के लिए स्पेश तलाश करती दिख रही है। मुख्य अतिथि हरीश करमचंदानी ने वैश्विक अर्थवाद की समस्याओं का जिक्र करते हुए समकालीन कवि धर्म को रेखांकित किया। परिचयों के प्रथम सत्र में राजस्थान की समकालीन हिन्दी कविता में लोक जीवन विषय पर पत्रवाचन डॉ. मदन गोपाल लढ़ा ने किया। सत्राध्यक्ष भंवरसिंह सामौर ने लोक संस्कृति और लोक संवेदना को व्याख्यापित किया। अन्य सभी सहभागियों द्वारा विषय पर गंभीर विमर्श किया गया। 
दूसरे दिन के विचार सत्र में प्रथम सत्र में राजस्थान की समकालीन हिन्दी कविता संवेदना और शिल्य विषय पर पत्रवाचन डॉ. उम्मेद गोठवाल ने किया, जिसमें उन्होंने कहा कि समकालीन कवियों की संवेदना में मानव जीवन एवं प्रकृति के विभिन्न पक्षों का विस्तार है। अध्यक्ष डॉ. नरपत सोढ़ा ने कहा कि समकालीन हिन्दी कविता का आधार घुटन से संत्रस्त मानव है। हरीश करमचंदानी ने कहा कि छंद मुक्तता कवि को आमजन से दूर कर रही है। अगले विचार सत्र में समकालीन हिन्दी कविता की परम्परा एवं विकास पर पत्रवाचन डॉ. गजादान चारण ने किया तथा सभी सहभागियों ने अपने विचार रखे। समारोह के समाचार सत्र में मुख्य अतिथि अशोक माथुर ने कविता के साथ हो रहे बाजारवाद के षडयंत्रों से कवि को सावधान रहने का संकेत दिया। साहित्यकार सत्यदीप ने कहा कि रोबोट एवं कम्प्युटर युग की विवशता में संवेदना को जीवित रखने का उत्तरदायित्व कवि पर ज्यादा हो गया है। कार्यक्रम का संचालन रवि पुरोहित ने किया।
इस दो दिवसीय कार्यक्रम के दौरान हनुमानगढ़ के कवि दीनदयाल शर्मा की कृतियों का लोकार्पण एवं समकालीन कवियों की कविताओं पर आधारित राजूराम बिजारणिया की चित्र प्रदर्शनी एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें अनेक कवियों ने अपनी काव्य प्रस्तुतियां दी।    

दानदाता रमेश जवेरी करेंगे एक हजार पौधारोपण, जिला कलेक्टर पवन ने की सराहना

सुमेरपुर (अनिल शाह)। ‘सेवा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। किसी दुखी के चेहरे पर खुशी की मुस्कान दिखती है तो आत्मा को संतुष्टी मिलती है। सेवा का भाव बहुत ही महत्वपूर्ण है।’ ये उद्गार है पाली जिले के नए जिला कलेक्टर नीरज के. पवन के। श्री पवन जिले के साण्डेराव के निकट दुजाणा गांव में सुमित्रादेवी पन्नालाल राणावत चेरिटेबल ट्रस्ट की ओर से आयोजित निःशुल्क नेत्र चिकित्सा शिविर के उदघाटन समारोह को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य को सेवा कार्य करने में तत्पर रहना चाहिए। मातृभूमि की याद करने वाले ऐसे सुपुतों के जज्बे को मैं सलाम करता हूँ। 
समारोह को समाजसेवी अनिल शाह ने सम्बोधित करते हुए जिला कलेक्टर की दानदाताओं को सम्मान व समर्थन एवं प्रशासनिक सहयोग देने की शैली की प्रशंसा करते हुए विश्वास जताया कि इनके कार्यकाल में गोडवाड व पाली जिले में विकास कार्यो के नए आयाम स्थापित होगें। दानदाता रमेश जवेरी ने कलेक्टर पवन की पहल पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के हरित राजस्थान कार्यक्रम के अंतर्गत सांडेराव से तख्तगढ़ सड़क मार्ग के दोनों तरफ करीब 1 हजार पौधरोपण कर उनके सार-संभाल की जिम्मेदारी ली। दानदाता रमेश जवेरी ने चार वर्ष पूर्व भी अपनी मां की स्मृति में करीब डेढ़ करोड़ रूपये की लागत से विद्यालय भवन का निर्माण कराया है। जिसका कलेक्टर पवन ने दुजाना पहुंचने पर निरीक्षण किया और कहा कि उन्होंने ऐसा विद्यालय पूरे राजस्थान मंे कहीं नहीं देखा। 

कलेक्टर की ओर से प्रेरित करने पर समाजसेवी रमेश जवेरी ने दुजाना में अपनी मां की स्मृति में एक ओर नया विद्यालय भवन का निर्माण करने की घोषणा की, जिसकी कलेक्टर ने तत्काल ही मौके पर स्वीड्डति दे दी। इस तुरंत स्वीड्डति के लिए भामाशाह रमेश जवेरी एवं तेजराज राणावत ने कलेक्टर श्री पवन का आभार व्यक्त किया। कलेक्टर पवन ने प्रजापिता ब्रहाकुमारी ईश्वरीय ग्लोबल अस्पताल की टीम द्वारा ट्रस्ट की ओर से आयोजित किए जा रहे निःशुल्क नेत्र चिकित्सा शिविर का भी  निरीक्षण किया और स्वयं अपनी आंखो की जांच कराई। जिला कलेक्टर नीरज पवन ने दानदाता रमेश जवेरी द्वारा शिक्षा व पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय कार्यो की सराहना करते हुए उन्हें हर सम्भव प्रशासनिक सहयोग देने का वादा किया। इस मौके पर समाजसेवी अनिल शाह, उपखण्ड अधिकारी नरेन्द्र बंसल, जिला वन अधिकारी अजय गुप्ता, बीडीओ दिनेश कुमार, प्रधान भंवरीदेवी गर्ग, तख्तगढ पालिकाध्यक्ष राजू रावल, जिला परिषद सदस्य हरिशंकर मेवाड़ा, महेश मीणा सहित गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। 
किशोर खीमावत से मिली प्रेरणा: दानदाता रमेश जवेरी को यह पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा गोडवाड हरा भरा बनाने वाले पर्यावरणविद् किशोर खीमावत से मिली। किशोर खीमावत अब तक करीब 2 लाख पौधे लगा चुके है। दानदाता जवेरी व जिला कलेक्टर नीरज के. पवन ने किशोर खीमावत के रणकपुर से रामदेवरा ग्रीन हाईवे प्रोजेक्ट की सराहना करते हुए उन्हें शुभकामनाएं प्रेषित की। ज्ञात रहे कि किशोर खीमावत रणकपुर से रामदेवरा तक कुल 450 किमी. सडक के दोनों ओर पौधरोपण करने के लिए संकल्पित है।

निगम महापौर की कार्यशैली से नाराज बने हुए पत्रकारों ने किया विरोध प्रदर्शन

लघु व मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रों की उपेक्षा निन्दनीय और अलोकतांत्रिक कार्य: जीनगर गहलोत


कोटा। राष्ट्रीय मेला दशहरा के कार्यक्रमों की जानकारी देने के लिए गत दिनों 13 अक्टूबर बुधवार को निगम की ओर से स्थानीय चम्बल गॉर्डन स्थित दशहरा मेला समिति कार्यालय पर आयोजित हुई पत्रकार वार्ता में निगम द्वारा लघु व मध्यम श्रेणी के कहे जाने वाले समाचार पत्रों की उपेक्षा होने पर पत्रकारों ने नाराजगी जाहिर कर विरोध प्रदर्शन किया और महापौर डॉ. रत्ना जैन सहित निगम अधिकारियों के खिलाफ नारेबाजी की।  हाड़ौती पत्रकार संघ के अध्यक्ष पंडित बद्रीप्रसाद गौतम और महामंत्री अनिल तिवारी के नेतृत्व में आयोजित हुए इस विरोध प्रदर्शन को उचित ठहराते हुए इनके समर्थन मंे पत्रकार वार्ता में शामिल हुए प्रेस क्लब कोटा के सचिव हरिमोहन शर्मा सहित वरिष्ठ पत्रकार सदस्य कय्यूम अली, मनोहर पारीक, हरिवल्लभ मेघवाल, जितेन्द्र शर्मा, दिलीप सिंह शेखावत आदि ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस व निगम द्वारा आयोजित भोज का बहिष्कार किया और विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए।
हाड़ौती पत्रकार संघ के प्रवक्ता असलम रोमी ने अनुसार निगम की इस पक्षपातपूर्ण कार्यशैली को लेकर कुछ समय पहले ही महापौर, उपमहापौर, मेला समिति अध्यक्ष, मुख्य कार्यकारी अधिकारी आदि को संघ की ओर से ज्ञापन पत्र भी दिया जा चुका है। लेकिन निगम अधिकारियों की मनमानी और महापौर की गैरजिम्मेदाराना कार्यशैली के कारण से पत्रकारों को मजबूर होकर यह विरोध प्रदर्शन करना पड़ा। संघ के अध्यक्ष बद्रीप्रसाद गौतम और सचिव अनिल तिवारी ने कहा कि जहां एक ओर प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इन लघु व मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रों के हितों के लिए प्रयासरत बने हुए हैं, वहीं दूसरी ओर नगर निगम कोटा की कांग्रेस की ही महापौर डॉ. रत्ना जैन द्वारा समझ कर भी नासमझ बन जानबूझकर लघु व मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रों की उपेक्षा की जा रही है। इसलिए यदि इस कांग्रेसी महापौर को कांग्रेस की जन कल्याणकारी नीतियों का विरोधी भी कहा जाये तो शायद गलत नहीं होगा।
इस विरोध प्रदर्शन में मुख्य रूप से बद्रीप्रसाद गौतम, अनिल तिवारी, अब्दुल अलीम, भगवानदास महावर, हलीम रेहान, लक्ष्मीकांत शर्मा, सलीमुद्दीन काजी, अनिल देवलिया, मुरलीधर शर्मा, मुकुटलाल पंवार, रूपचंद जैन, मुनीफुर्रहमान, जीएस भारती, मोहनलाल बड़ौदिया, देवकीनंदन योगी, दीपक परिहार, भारत सिंह चौहान, रमेश गौड़, धर्मेन्द्र पूनिया आदि शामिल हुए। पाक्षिक समाचार सफ़र के प्रकाशक व संपादक जीनगर दुर्गाशंकर गहलोत ने नगर निगम की इस पक्षपातपूर्ण कार्यशैली की निंदा करते हुए इसे आलोकतांत्रिक कार्य बताया और कहा कि यदि कांग्रेसी महापौर चिकित्सक रत्ना जैन को लघु व मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रों से इस कदर नफरत है और उनकी निगाह ये छोटे समाचार पत्र ‘अछूत समान’ हैं तो वह खुले रूप से अपनी बात को स्पष्ट करें। अन्यथा यह शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन संभवतः उनके शेष बचे हुए कार्यकाल के लिए ‘आत्मघाती’ साबित हो सकता है। ‘पद के दंभ’ से सत्ताएं नहीं चला करती है और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के शब्दों में ‘हर गलती कीमत मांगती है’।    
जीनगर गहलोत ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से इस मामले में हस्तक्षेप कर लघु व मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रों को हरसंभव सहयोग किये जाने की मांग करते हुए जिला प्रशासन के प्रमुख अधिकारियों से भी आग्रह किया है कि वह शासकीय व प्रशासकीय स्तर की होने वाली हर पत्रकार वार्ता में लघु व मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रों की उपेक्षा ना होने दें और इसके लिए सभी संबंधित अधिकारियों को आवश्यक आदेश/निर्देश जारी करें ताकि हर कॉन्फ्रेन्स में उनको भी आवश्यक रूप से आमंत्रित किया जाना शुरू हो सकें। वहीं, इस ओर राज्य सरकार के पीआरओ कार्यालय एवं केन्द्र सरकार के पीआईबी कार्यालय के प्रभारी अधिकारी भी ध्यान दें। जीनगर गहलोत ने उक्त प्रदर्शन के दौरान प्रेस क्लब कोटा के अध्यक्ष धीरज गुप्ता के निगम की आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेन्स में मौजूद होने के बावजूद भी प्रदर्शनकारियों का समर्थन नहीं करने को चिन्तनीय व विचारणीय बताया और कहा कि जिस संस्था का प्रमुख यदि अपने सदस्यों की वाजिब मांगों के समर्थन पर मौन रहता है तो उस प्रमुख को अपने पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं होता है।
प्रेस क्लब, पत्रकारों का एक सम्मानीय संगठन है, सरकारी संस्था नहीं कि इसके पदाधिकारी अपने निज हित की खातिर संगठन के सम्मान को ही गिरवी रख दें। जनधन पर ‘दानवीर’ बने हुए इन ‘लुटेरे दानदाताओं’ द्वारा ‘दान’ समान दिये जाने वाला ‘भोज’ तो वर्ष भर में अधिकतम 65 दिन ही संभव हो सकेगा, बाकी के 300 दिन तो अपने घर पर ही ‘दाना-पानी’ चुगना होता है - प्रेस क्लब के पदाधिकारी और पत्रकारजन इस सत्य को सदैव ध्यान रखें और अपने सम्मान व पत्रकारिता दायित्व को कभी नहीं भूले, यदि वह अपने आपको ‘पत्रकार’ मानते हैं तो।         

हिन्दुत्व के सवालों को लिए हुए दलित कारसेवक की व्यथा-कथा

अयोध्या में राम मंदिर पर फैसले की घड़ी नजदीक आई तो उसको याद आया कि वो भी एक हिंदू कारसेवक था और मंदिर के लिए अयोध्या तक गया था। मगर अब वो महज एक दलित है। तब अयोध्या में विवादित ढांचा टूटा था, लेकिन विश्व हिंदू परिषद् के सक्रिय कार्यकर्ता रहे जयपुर जिले के चकवड़ा गांव के हरिशंकर बैरवा जब अपने गाँव लौटे और जो कुछ देखा, तो उससे उनका दिल टूट गया। उन्हें सहसा याद दिलाया गया कि वो महज एक दलित हैं, वो हिंदू तो हैं, मगर दर्जे से दोयम हैं। इसीलिए टूटे हुए दिल के हरिशंकर कहते है, ‘‘फिर मंदिर के लिए कार सेवा का आव्हान हुआ तो वो खुद तो क्या कोई भी दलित अयोध्या का रुख नहीं करेगा’’। हरिशंकर कारसेवक के रूप में चकवड़ा से गए कोई 10 लोगों के जत्थे में अकेले दलित थे। वो कहने लगे, ‘‘हम वहाँ मर भी सकते थे। गोलियाँ चली, कई लोग जख्मी हुए थे, पकड़े गए तो 15 दिन बुलंदशहर जेल में भी रहे। तब यही बताया गया कि हम सब हिंदू हैं, न कोई ऊंच है न नीच। पर ये सब फरेब ही था।’’
‘‘वो सिर्फ हिंदू-मुसलमानों की बात करते हैं. मगर जब दलित के साथ जुल्म की बात आती है तो वो चुप हो जाते हैं.’’ 
- हरीशंकर चकवड़ा, जयपुर 
तूफान
हरिशंकर की जिंदगी में यह तूफान तब आया जब गाँव के साझा तालाब में दलितों ने सदियों पुरानी उस परंपरा को बहुत सरल भाव से तोड़ने का प्रयास किया जिसमें दलित के लिए अलग घाट बना हुआ था। उनका कहना था, ‘‘उस दिन ‘सब हिंदू बराबर है’ की मानस पर अंकित तस्वीर टुकड़े-टुकड़े हो गई, जब हम पर जुर्माना लगाया गया, हमें अपमानित किया गया, हम पर हमले के लिए हिंदुओं की भीड़ जमा हुई और तालाब में दलितों के घाट से अलग पानी लेने पर गंभीर परिणामों की चेतावनी दी गई।’’ उस दिन मेरा मन बार-बार ये ही पूछता रहा- ‘‘क्या हम हिंदू नहीं है? अगर हिंदू हैं तो फिर ये सलूक क्यों?’’ ये सवाल उठाते हुए हरिशंकर के चेहरे पर कई भाव चढे़ व उतरे। वो कहने लगे, ‘‘एक विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ता के नाते मैं अभिभूत था। लगा अभी साधु संत आएंगे, अभी प्रवीण तोगड़िया जी आएंगे। हम उन तक गए, गुहार भी की। मगर दलित के लिए कौन बोलता? क्योंकि वो तो कहने के लिए ही हिंदू हैं।’’
कभी हरिशंकर भी  ‘सौगंध राम की खाते हैं’ के नारे लगाते थे, मगर अब उनके घर में बने हुए एक संकुचित से पूजा घर में राजस्थान के लोक देवता रामदेव, गौतम बुद्ध और अम्बेडकर सबसे बड़े भगवान हैं। मैंने पूछा आरएसएस से कब से जुड़े हो? तो वे मुझे अतीत में ले गए, ‘‘आरएसएस में बचपन से ही जाना शुरू किया। वहां हमें बताया गया कि पूरे समाज को समरस बनाना है। मुझे ये ठीक लगा। फिर मंदिर का मुद्दा आया। हमें विहिप ने बताया कि अपने हिंदुओं के मंदिर पर मुसलमानों ने कब्जा कर लिया, उसे मुक्त कराना है। हम ये ही सोचकर गए कि सब हिंदू सामान है, सब भाई हैं।’’ फिर ऐसा क्या हुआ कि वो अब विरोध में खड़े है? क्या उनको बहका दिया है...? 
हरिशंकर कहते हैं, ‘‘जब तालाब से पानी की बात आई तो मैंने इनके व्यवहार में फर्क देखा। मैं विहिप के नेताओं के पास गया कि दलितों के साथ बुरा सलूक हो रहा है, मगर उन्होंने कोई रुचि नहीं ली। दलितों के साथ कदम-कदम पर भेदभाव होता है, उन्हें मंदिर में नहीं जाने दिया जाता, उनकी शादियों में बारात पर हमले होते है, विवाह में बैंड बाजे नहीं बजाने देते - ये बात कई बार मैंने विहिप की बैठकों में उठाई, पर किसी ने रूचि नहीं ली।’’
वो कहते हैं, ‘‘वो सिर्फ हिंदू-मुसलमानों की बात करते हैं. मगर जब दलित के साथ जुल्म की बात आती है तो वो चुप हो जाते हैं. हम पर विपत्ति आई तो गांव में विहिप समर्थक 50 लोग थे, या तो वे खामोश थे या भागीदार थे। मैंने विहिप वालों से कहा ये ठीक नहीं है, हम हिंदू धर्म से अलग हो जाएंगे।’’ जबकि, दूसरी ओर हिंदू संगठन अपनी इस असलियत को छिपाने के लिए कहते हैं कि इन दलितों को किसी ने बहका दिया है। वहीं, साधु-संत और धर्मग्रंथ कहते हैं कि न कोई ऊँचा है न कोई नीचा, यानि ‘हरी को भजे सो हरी का होय।’ मगर ये शायद जिंदगी का यथार्थ नहीं है। न जाने क्यों जब भी कोई दलित मंदिर की देहरी चढ़ता है या फिर पोखर, तालाब, और कुएँ पर प्यास बुझाने के लिए हाथ बढ़ाता है, उसे उसका सामाजिक दर्जा याद दिलाया जाता है। पर- क्या आस्था और प्यास को ऊंच-नीच में बांटा जा सकता है?
- नारायण बारेठ, बीबीसी संवाददाता, 
बी-47, अशोक विहार,  सेक्टर नं. 11 के पीछे, 
मालवीय नगर, जयपुर (राज.)   मो. : 94140-42277

अयोध्या प्रकरण - क्या इलाहाबाद हाईकोर्ट का निर्णय गैर-वैज्ञानिक सोच और अंधविश्वास को बढ़ावा देता है ?

भारत का संविधान लागू होने के बाद से आज तक न्यायपालिका के किसी भी निर्णय पर शायद ही इतनी परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएं हुई हों, जितनी कि हाल ही में इलाहबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच द्वारा अयोध्या मामले में दिए गए  निर्णय पर र्हुइं। जहां अनेक लोग निर्णय का स्वागत कर रहे हैं वहीं ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो उसे गलत ठहरा रहे हैं। सारा देश सांस रोककर  इस निर्णय की प्रतीक्षा कर रहा था। पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट इस निर्णय की घोषणा 24 सितम्बर को करने वाला था परंतु इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय की घोषणा पर रोक लगा दी और अंततः 30 सितम्बर को यह निर्णय सुनाया गया। 24 और 30 सितम्बर को पूरे देश में जिस बड़े पैमाने पर सुरक्षा व्यवस्था की गई, वह भी अभूतपूर्व थी।
क्या हम इतने असहिष्णु व अनुशासनहीन हैं कि न्यायपालिका के निर्णय को भी नहीं पचा सकते? जबकि हमारी संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार- हम संसद के फैसलों से असहमत हो सकते हैं। हम कार्यपालिका के निर्णयों से भी असहमत हो सकते हैं और उन्हें अस्वीकार कर सकते हैं। परंतु न्यायपालिका के किसी निर्णय से भले ही हम असहमत हों, परंतु हमें उसे स्वीकार करना ही होता है। एक कातिल को मौत की सजा सुनाई जाती है। वह भले ही इस निर्णय से असहमत हो परंतु उसे निर्णय को हर हालत में स्वीकार करना ही होगा।
लेकिन इस निर्णय को लेकर जिस बड़े पैमाने पर सुरक्षा व्यवस्था की गई थी उसका एक कारण यह संदेह था कि शायद समाज का एक हिस्सा न सिर्फ निर्णय को अस्वीकार कर देगा वरन् अपना आक्रोश प्रगट करने के लिए हिंसा का सहारा लेगा। यदि ऐसी स्थिति बनती तो उस पर नियंत्रण पाने के लिए ही यह कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। इसका अर्थ बहुत साफ है। वह यह कि जहां एक व्यक्ति असहमत होते हुए भी न्यायालय के निर्णय को स्वीकार कर लेता है परंतु समाज ऐसा नहीं करता। यह इस बात का परिचायक है कि आज़ादी के 63 वर्ष बाद भी हम एक परिपक्व राष्ट्र नहीं बन सके हैं। निर्णय के दिन देश भर में सुरक्षा के इतने जबरदस्त इंतजामात थे जिसमें यह उम्मीद करना स्वाभाविक था कि नागरिक बिना डरे अपनी दैनिक गतिविधियां चालू रखेंगे। परंतु ऐसा नहीं हुआ और 30 सितंबर को व्यापारियों ने दुकानंे बंद कर लीं, दोपहर बाद सरकारी कार्यालय सूने हो गए, अधिकांश स्कूलों में छुट्टी घोषित कर दी गई और बहुसंख्यक लोग अपने घरों से नहीं निकले। सड़कों पर बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे और पतंग उड़ा रहे थे। यहां तक कि अस्पतालों में मरीज नहीं आये और डाक्टरों व नर्सों की उपस्थिति भी कम रही। अदालतें भी सूनी रहीं। यह स्थिति क्या इस बात की परिचायक नहीं है कि आम लोगों को सरकार और उसके द्वारा किये गये सुरक्षा बंदोबस्त पर भरोसा नहीं है? क्या उन्हें यह विश्वास नहीं है कि किसी अप्रिय घटनाक्रम के चलते पुलिस उनकी रक्षा कर पायेगी? क्या आमजनों को यह आशंका थी कि यदि कहीं भीड़ एकत्रित हो जायेगी तो पुलिस उसके सामने आत्मसमर्पण कर देगी? आम जनता और शासन के बीच बनी हुई अविश्वास की यह खाई निश्चित ही चिंताजनक है। जहां तक न्यायपालिका का सवाल है तो पिछले कुछ वर्षों में उसकी प्रतिष्ठा में भारी गिरावट आई है। आये दिन न्यायपालिका पर पक्षपात और भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं, तो कुछ न्यायाधीशों को भ्रष्ट आचरण के कारण बर्खास्त भी किया गया है। इस निर्णय के संदर्भ में कुछ लोगों की यह मान्यता है कि यह न्यायिक निर्णय नहीं वरन् न्यायपालिका द्वारा सभी का तुष्टीकरण करने की कोशिश है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि निर्णय करते समय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों की उपेक्षा की गई है। संविधान में निहित प्रावधानों के अनुसार- आम लोगों में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने का उत्तरदायित्व राज्य कोे सौंपा गया है और न्यायपालिका भी राज्य का ही हिस्सा है। आज भी हमारे देश की एक बहुत बड़ी आबादी अंधविश्वास के दलदल में फंसी हुई है।
अंधविश्वास के कारण ही आज भी गांवों में किसी भी औरत को ‘टोहनी’ (डायन) बताकर इस संदेह में मार डाला जाता है कि उसके कारण गांव पर कोई विपत्ति आ सकती है। ‘टोहनी’ जैसा ही यह निर्णय हुआ है। जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह कहा है कि- विवादित स्थल ही राम की जन्मभूमि है। अदालत ने यह बात इस आधार पर कही कि हिन्दुओं की ‘आस्था’ के अनुसार राम का जन्म ठीक उसी स्थल पर हुआ था। जबकि इसमें पहली बात तो यह है कि सभी हिन्दू यह नहीं मानते कि राम वहीं पैदा हुये थे। इसलिए अदालत ज्यादा से ज्यादा यह कह सकती थी कि कुछ हिन्दुओं की आस्था के अनुसार राम वहीं पैदा हुये थे। इसके अतिरिक्त, अदालत को यह भी कहना था कि यह मात्र ‘आस्था’ ही है जिसका कोई ‘तर्कसंगत आधार’ नहीं है।
क्योंकि सदियों पूर्व घटी किसी घटना के संबंध में कोई भी बात पूरे विश्वास के साथ नहीं कही जा सकती। फिर, यह भी तय किया जाना है कि- राम भगवान थे या इंसान? यदि वे भगवान थे तो भगवान न तो पैदा होते हैं और न ही मरते हैं। यदि संघ परिवार या अन्य कोई हिन्दू संगठन राम को भगवान मानता है तो उनके जन्म का तो प्रश्न ही नहीं उठता। और, यदि उन्हें इंसान माना जाता है तो वे सदियों पहिले पैदा हुए होंगे। जबकि हमने तो यह भी माना है कि वे कलयुग में पैदा नहीं हुये थे। फिर हिन्दू मान्यता के अनुसार कलयुग को प्रारंभ हुए भी हजारों वर्ष बीत चुके हैं। वहीं पिछले कुछ हजार वर्षों में पृथ्वी में अनेक भौगोलिक परिवर्तन भी हुए हैं। उन परिवर्तनों के कारण अनेक महल, अनेक किले बल्कि पूरे-पूरे शहर तक धराशायी हो धरती के गर्भ में समा गए होंगे। इसलिए यह कहना कि राम किसी स्थल विशेष पर पैदा हुये थे, अत्यधिक गैर वैज्ञानिक और अतार्किक हैै। फिर, राम का जन्मस्थल या तो घर रहा होगा या महल। उस समय अस्पताल तो थे नहीं। इस तरह राम के जन्मस्थल पर महल होना था न कि मंदिर। वैसे भी अयोध्या के  सभी मंदिरों के पुजारी दावा करते हैं कि राम उन्हीं के मंदिर में पैदा हुए थे। जब अयोध्या के हमारे पत्रकार मित्र शीतला सिंह ने रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष से जानना चाहा कि आप किस आधार पर दावा करते हैं कि राम यहीं पैदा हुए थे तब उन्होंने फरमाया कि यदि राम स्वयं प्रकट होकर कहें कि वे यहां पैदा नहीं हुए थे तो भी हम उनकी बात नहीं मानेगे और यह दावा करते रहेंगे कि राम की जन्मस्थली यही है। इस तरह के दावों से ही यह सिद्ध हो जाता है कि राम की जन्मभूमि का दावा किस हद तक गैर-वैज्ञानिक चिंतन पर आधारित है। इसलिए किसी भी तार्किक सोच वाले व्यक्ति के लिए यह स्वीकार करना कठिन है कि- राम की जन्मस्थली, विवादित स्थल पर ही है।
अब विचारणीय प्रश्न यह है कि- क्या वहां राम मंदिर था? तो हाईकोर्ट ने इस बात को मान लिया है कि वहां राम मंदिर था और यह भी कि बाबरी मस्जिद, राम मंदिर के ऊपर बनी थी। अदालत का यह मत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ;एएसआईद्ध द्वारा की गई खुदाई पर आधारित है, जबकि अदालत के इस निष्कर्ष को देश के अनेक इतिहासकारों ने चुनौती दी है। उनका कहना है कि खुदाई के दौरान वहां पशुओं की हड्डियां पाई र्गइं। इसके अतिरिक्त वहां पर सुरखी तथा चूने का मिलना भी मस्जिद की उपस्थिति का ही संकेत देता है। उनका यह भी कहना है कि खुदाई में जो अन्य चीजे मिली थीं उनका परीक्षण इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों से कराया जाना चाहिए, ताकि सही तथ्य सामने आ सकंे। जिन इतिहासकारों ने इस आशय का बयान जारी किया है, वे हैं- श्रीमती रोमिला थापर, के. एम. श्रीमाली, के.एन. पन्नीकर, इरफान हबीब, उत्स पटनायक और सी.पी. चन्द्रशेखर। ये सभी अपने-अपने क्षेत्रों के विशेषज्ञ हैं इसलिए उनकी राय की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
वैसे विभिन्न अखबारों ने भी इस निर्णय पर भिन्न-भिन्न टिप्पणियां की हैं जिसमें इकॉनामिक टाइम्स ने तो उसे गैर-न्यायिक निर्णय कहा है। अखबार का कहना है कि इस निर्णय से न तो कानूनी स्थिति साफ हुई है और न ही समझौते का रास्ता प्रशस्त हुआ है। यह निर्विवाद  है कि इस निर्णय से तनाव की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई है। यही एकमात्र संतोष की बात है। परंतु क्या यह शांति आगे भी बनी रहेगी? - इस प्रश्न का उत्तर देना फिलहाल संभव नहीं है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध कार्यकर्ता हैं)
- एल. एस. हरदेनिया
ई-4, 45 बंगले, भोपाल - 462003 (म.प्र.)
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अयोध्या निर्णय : गुनाह करो और इनाम पाओ !

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच की तीन जजों की पीठ ने अयोध्या मामले में 30 सितम्बर 2010 को फैसला सुनाया। आशंकाओं के विपरीत, उस दिन और उसके बाद देश में कहीं हिंसा नहीं हुई। इसका श्रेय आमजनों की परिपक्व सोच को जाता है। किन्तु, जहां तक इस निर्णय का सवाल है तो यह फैसला तीनों ही संबंधित पक्षकारों यथा-रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड-के बीच संतुलन कायम करने की कवायद के सिवाय कुछ नहीं है, जिसमें विवादित भूमि को तीन भागों में बांट दिया गया है और तीनों पक्षकारों को बराबर-बराबर जमीन दे दी गई है। अपने इस फैसले मेें अदालत ने यह भी कहा है कि चूंकि हिन्दुओं की आस्था के अनुसार बाबरी मस्जिद के बीच के गुंबद के ठीक नीचे भगवान राम का जन्मस्थल है इसलिए वह हिस्सा हिन्दुओं को दिया जाना चाहिए। इस फैसले से उत्साहित बने आरएसएस प्रमुख ने घोषणा की है कि अब विवादित भूमि पर भव्य राम मंदिर बनाने का रास्ता साफ हो गया है और इस ‘राष्ट्रीय कार्य’ में सभी पक्षों को अपना सहयोग देना चाहिए।
यों इस मामले में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव द्वारा व्यक्त की गई प्रतिक्रिया ठीक ही है कि- इस फैसले से मुसलमान अपने आपको ठगे से महसूस कर रहे हैं। लेकिन, जिसे ‘राजनीतिक लाभ’ प्राप्ति का रूप दे दिया गया है। आखिर, इस सचाई पर टिप्पणी एक राजनेता ने जाहिर की है, जो अन्य राजनेताओं को हजम नहीं हो पा रही है। जबकि, इस विवाद से जुड़ा हुआ मुख्य विवाद और विचार करने की बात यह है कि- पहले तो उस मस्जिद में रात के अंधेरे में कुछ शरारती तत्व जबरदस्ती घुसकर रामलला की मूर्तियां स्थापित कर देते हैं। फिर, एक योजनाबद्ध षड़यंत्र के तहत संघ परिवार उस मस्जिद को ही जमींदोज कर देता है। और अब, न्यायालय ने संघ के इस विध्वंसकारी दावे पर ही अपनी मोहर लगा दी है कि भगवान राम उसी स्थल पर जन्मे थे! ऐसा लगता है कि इतिहास के वैज्ञानिक अध्ययन में रत अध्येता अपना समय और उर्जा बर्बाद कर रहे हैं, क्योंकि उनके ज्ञान की किसी को कोई जरूरत ही नहीं है। आखिर, इस फैसले से यही तो साबित हो रहा है कि इतिहास और पुरातत्व विज्ञान चाहे कुछ भी कहता रहे, कोई महत्व नहीं रखता। क्योंकि कोई भी राजनैतिक शक्ति, किसी भी आधारहीन तथ्य को आस्था का जामा पहना देगी और फिर उस आस्था के अनुरूप गैर-कानूनी कार्य करेगी तथा अंततः अदालत भी उसके इन आपराधिक कृत्यों को इस आधार पर सही ठहरा देगी कि- वे समाज के एक हिस्से की आस्था पर आधारित हैं! इस देश के जो नागरिक हमारे स्वाधीनता संग्राम और भारतीय संविधान के मूल्यों में आस्था रखते हैं, उनके लिए निश्चित ही यह अकल्पनीय है कि- देश की कोई अदालत इस तरह का निर्णय भी दे सकती है।
संघ परिवार ने सन् 1980 के दशक में राममंदिर आंदोलन का पल्ला थामा और उसने योजनाबद्ध (जिसे साजिश कहना उचित होगा) तरीके से हिन्दुओं के एक तबके को यह विश्वास दिला दिया कि भगवान राम ठीक उसी स्थल पर पैदा हुए थे जहां बाबरी मस्जिद स्थित थी। जबकि इसमें दिलचस्प बात यह है कि चन्द सदियों पहले तक राम, हिन्दुओं के प्रमुख देवता नहीं  थे। वे मध्यकाल में प्रमुख हिन्दू देवता बने, विशेषकर गोस्वामी तुलसीदास द्वारा राम की कहानी को सामान्य जनों की भाषा अवधी में प्रस्तुत करने के बाद। तब तक वाल्मिकी की संस्कृत रामायण प्रचलन में थी और चूंकि संस्कृत श्रेष्ठि वर्ग की भाषा थी इसलिए राम के पूजकों की संख्या भी अत्यन्त ही सीमित थी। तब के ब्राह्मण भी तुलसीदास से बहुत नाराज थे क्योंकि उन्होंने ब्राह्मणों की देवभाषा संस्कृत की जगह जनभाषा अवधी में रामकथा को लिखा। विचारणीय यह भी है कि जिस समय विवादित भूमि पर स्थित कथित राम मंदिर को तोड़ा गया था उस समय तुलसीदास की आयु लगभग 30 वर्ष रही होगी। तो क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि- तुलसी जैसे अनन्य रामभक्त द्वारा अपनी इस ‘रामकथा’ में कहीं भी इस बात की चर्चा तक नहीं की गई कि उनके आराध्य के जन्मस्थल पर बने मंदिर को एक आतातायी बादशाह ने गिरा दिया है!
यह साफ है कि शासक-चाहे वे किसी भी धर्म के रहे हों-केवल सत्ता और संपत्ति के उपासक थे। कई मौकों पर वे युद्ध में पराजित राजा को अपमानित करने के लिए उसके राज्य में स्थित पवित्र धर्मस्थलों को भी नष्ट कर देते थे परंतु इसके पीछे केवल राजनीति होती थी, धर्म नहीं। लेकिन अंग्रेजों ने अपनी ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के तहत इतिहास की इन घटनाआंे को इस रूप में प्रस्तुत किया कि- मुस्लिम राजाओं ने हिन्दू धर्म का अपमान करने के लिए हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त किया। अंग्रेजी लेखकों द्वारा साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से लिखे गए इसी इतिहास ने दोनों समुदायों को एक दूसरे का शत्रु बना दिया और यही बैरभाव आगे जाकर साम्प्रदायिक हिंसा का कारण बना। बाबरी मस्जिद एक संरक्षित स्मारक थी जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भारत सरकार की थी। लेकिन, भारत सरकार न तो वर्ष 1949 में वहां गैरकानूनी ढंग से स्थापित रामलला की मूर्तियों को हटवा सकी और न ही वर्ष 1992 में ही मस्जिद पर संघ परिवार के हमले को रोक सकी। भारत सरकार की ये दो बड़ी असफलताएं थी और दुर्भाग्य से ये दोनों ही असफलताएं कांग्रेस शासन के समय में ही घटित हुई। ऐसे में, निश्चित ही अयोध्या मामले में हुए हालिया निर्णय से देश को साम्प्रदायिक आधार पर धु्रवीकृत करने के आरएसएस के एजेन्डे को ही बढ़ावा मिलेगा। इस निर्णय ने जहां एक ओर रामलला की मूर्तियों की स्थापना को कानूनी वैधता प्रदान की है, वहीं दूसरी ओर बाबरी मस्जिद को ढहाए जाने के अपराध को नजरअंदाज भी किया है। इस तरह से न्यायालय की ओर से संघ परिवार को अपने गुनाहों का शानदार इनाम मिला है।
वहीं, अब आरएसएस और उसके बाल-बच्चे यही कह रहे हैं कि मुसलमानों को अपने हिस्से की जमीन हिन्दुओं को सौंप देनी चाहिए ताकि  वहां पर भव्य राम मंदिर बनाकर ‘राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं’ की पूर्ति की जा सके। जबकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि- भारतीय राष्ट्र, केवल हिन्दुओं का ही नहीं है। वहीं, सभी हिन्दू भी इस बात में विश्वास नहीं करते कि- विवादित स्थल ही भगवान राम की जन्मभूमि है और न ही सभी हिन्दू वहां राममंदिर बना देखना चाहते हैं। क्योंकि अधिकांश हिन्दू इस मंदिर-मस्जिद के मुद्दे से दूर ही रहे हैं और उन्हें अत्यन्त क्षोभ है कि आरएसएस ने भाजपा को सत्ता दिलाने के लिए आम हिन्दुओं की राम में बनी हुई आस्था का दुरूपयोग ही किया है। जब से राम मंदिर चुनावी मुद्दा बना, हिन्दुओं की बहुसंख्या ने कभी राम मंदिर के एजेन्डे का समर्थन नहीं किया। हिन्दुओं का एक तबका अवश्य राम मंदिर का समर्थक है परंतु विभिन्न चुनावों के परिणामों से साफ हो चुका है कि बहुसंख्यक हिन्दू, संघ द्वारा भाजपा के लिए निर्धारित किये हुए राम मंदिर के एजेन्डे के साथ नहीं हैं। हाल ही में किए गए कुछ सर्वेक्षणों से भी यह सामने आया है कि- हिन्दुआंें के एक बहुत छोटे से हिस्से के लिए यह ‘राम मंदिर’ एक मुद्दा है। जबकि युवा पीढ़ी को तो राम मंदिर विवाद से कोई लेना-देना ही नहीं है, विशेषकर ऐसे राम मंदिर से जिसे देश पर दो अपराधों के जरिए थोपा जा रहा हो।
वहीं, अब कांग्रेस भी इस मुद्दे को मिल-बैठकर सुलझाने की बात कर रही है। जबकि संवाद के जरिए इस मुद्दे का किस तरह से क्या हल निकाला जा सकता है? - यह भी विचारणीय बात है। पहली बात तो यह है कि कोई भी हल न्यायपूर्ण होना चाहिए और उसमें सभी संबंधित पक्षकारों के अधिकारों को मान्यता मिलनी चाहिए। क्या कोई भी समझौता केवल लेन-देन के आधार पर ही हो सकता है? लेकिन जो लोग मुस्लिम समुदाय से सहयोग और समझौता करने के लिए कह रहे हैं, क्या वे यह वायदा कर सकते हैं कि उसके बाद देश में मुसलमानों को सुरक्षा और समानता मिलेगी? मुस्लिम समुदाय जो सामाजिक-आर्थिक मानकों पर पिछड़ता जा रहा है, तब क्या सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्रा आयोग की रपटें बिना किसी देरी के लागू की जाएंगी? क्या आरएसएस राम मंदिर के बदले ये सब देने को तैयार है? क्या इसके बाद भारत मंे मुसलमान महफूज रहेंगे? विचारणीय तो यह भी है कि- मुसलमान भारत की आबादी का केवल 13.4 प्रतिशत हैं, जबकि दंगों में मारे जाने वालों में से 80 प्रतिशत मुसलमान ही होते हैं, आखिर क्यों? ऐसे में, क्या मुसलमानों के सहयोग से अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनने के बाद आरएसएस अपने शिशु मंदिरों में मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने वाली पाठ्पुस्तकें पढ़ाना बंद कर देगा? ये वे मुख्य सवाल हैं जिनका जवाब आरएसएस और इसके विभिन्न शिशु संगठनों को खुले रूप से व साफ मन से देना होगा।
यों, इस तरह के समझौते में कोई समस्या भी नहीं है। बल्कि, यह तो बहुत ही अच्छा होगा कि अयोध्या में राम मंदिर के बदले ईसाई और मुस्लिम अल्पसंख्यकों को देश मंे समानता का दर्जा मिल जाएऋ उनके खिलाफ किया जा रहा आधारहीन दुष्प्रचार बंद हो जाए और सरकार भी मनमोहन सिंह के इस वायदे पर अमल करने को तैयार हो जाए कि देश के संसाधनों पर मुस्लिम अल्पसंख्यकों का पहला हक है। लेकिन सवाल यह भी है कि- क्या राम मंदिर बनाने में सहयोग किये जाने के बदले साम्प्रदायिक दंगों के दोषियों को सजा मिलना सुनिश्चित किया जा सकेगा? दिल्ली के सिक्ख विरोधी दंगों और मुंबई व गुजरात की मुस्लिम विरोधी हिंसा के लिए दोषी व्यक्ति, जो आज भी छाती फुलाए घूम रहे हैं, क्या उनको उनके कुकर्मों की सजा दिलवाना, उस ‘बातचीत’ से निकाले जाने वाले हल का भाग होगा? क्या मुसलमानों से त्याग की अपेक्षा करने के पहले भारतीय राज्य उन्हें यह गारंटी नहीं देना चाहेगा कि देश मंे कानून का राज रहेगा और उन्हेें पूरी सुरक्षा और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलेंगे?
यह साफ है कि राम मंदिर के मुद्दे का इस्तेमाल भारतीय संविधान की आत्मा को आहत करने और विभिन्न समुदायों के बीच सद्भाव को खत्म करने के लिए किया जाता रहा है। अल्पसंख्यकों से त्याग करने की अपील तो हम सब कर सकते हैं, जबकि हम सभी को यह भी मालूम है कि उन्हें इस त्याग के बदले कुछ नहीं मिलेगा। साम्प्रदायिकता हमारे देश की सामूहिक सोच में इतनी मजबूत जड़ें जमा चुकी है कि मुसलमानों को दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया है। हिन्दू राष्ट्र के पैरोकार व हिन्दुत्व की राजनीति के झंडाबरदार, कभी भी मुसलमानों को शांति और गरिमा से नहीं रहने रहने देना चाहते। वहीं, संघ परिवार के लिए रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताएं कम महत्वपूर्ण हैं और अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए राम मंदिर, राम सेतु, गौ-हत्या आदि जैसे काल्पनिक मुद्दे अधिक।
यह सचमुच ही अत्यन्त दुःखद है कि समाज और राजनीति का इस हद तक साम्प्रदायिकीकरण हो चुका है कि एक राजनैतिक धारा-विशेष द्वारा प्रायोजित ‘आस्था’, अब न्यायिक निर्णयों का आधार बन रही है। इसलिए यह भारत के लिए एक बहुत ही बुरा दिन है। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि युवा पीढ़ी और वे सब जो भारतीय संविधान में विश्वास करते हैं, संकीर्ण पहचान की राजनीति से दूरी बनाएंगे, उस राजनीति से जो धार्मिक आस्था को सत्ता तक पहुंचने का शार्टकट बनाना चाहती है। हमंे उम्मीद है कि हम ऐसे समाज को बनाने में सफल हांेगे जहां सबको न्याय मिलेगा और समाज के पिछड़े वर्गों के साथ विशेष रियायत बरती जाएगी।

(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

-  डा. राम पुनियानी
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